सिसकियाँ

रफीक न इक पास आया, जब जब तलब करता रहा
ऐसा मुकद्दर था कहाँ तनहाईयों के दौर में ।

इतना बुरा हरगिज़ न था, जितना मुझे रुस्वां किया
तकदीर क्यों कर रास आए, रुसवाईयों के दौर में ।
लाख कोशिश गुल ने की,शाख को पकड़े रहूं,
गिर पड़ा नाकाम हो,पुरवाईयों के दौर में ।

निकले कहार सामने, माशूक़ की डोली उठा,
सिसकियाँ दबती रहीं शहनाईयों के शोर में ।
छानते फिरते रहे, कूँचे गली ढूंढा किये
कैसे पता मिलता मेरा,गुमनामियों के दौर में ।
गुहार-ए-अरज क्यूँ कोई सुनता,एहसान क्यूँ करता कोई
मुश्किल बुलन्दी पर रही,दुश्वारियों के दौर में ।
कतरा कतरा जख्म को, दामन में छुपा, रखते रहे
हमदर्दियाँ दुश्वार थी,बर्बादियों के दौर में ।

समझौता

चार कदम तुम चल कर आओ
चार कदम हम आ जाऐंगे
रस्ते आधे हो जाएं
कुछ ठहरें,कुछ सुस्ताऐं।

इस भागदौड़ की दुनियाँ में,
जो हासिल किया वो ,जिया नहीं
क्या मिला दौड़ते रहने से
जो दिल में था, वो किया नहीं ।
ये तो यकीनन मालुम है
कुछ तो मुझमें कमी होगी
कुछ बातें ऐसी तो होंगी
बेबसी में नहीं कहीं होंगी ।
जो ख्वाब बुने,सब उधड़ गये
कदम कदम पर बिखर गये
हाथों में आकर फिसल गये
चुपचाप राह से निकल गये।
ये बात कभी न कह पाई
हिम्मत ही नहीं जुटा पाई
दो लफ्ज़ बोलने लब खोले
लब सिल से गये, बिन कुछ बोले ।

अब जितना मुझे कुरेदोगे
कितना चाहे टटोलोगे
कुछ सतह पे न होगा जाहिर
जीभर कर चाहे खखोलोगे।
क्या रखा इन झंझावतों में
बीती और उखड़ी बातों में
हर कदम कदम समझौता है
ऐ दिल क्यूँ नाहक रोता है ।

अलफाज़ मुँह में रह गए

कायदों की पेचीदगी में, कुछ यूँ उलझ के रह गए,
कायदे पढ़ पढ़ थक गये,बेकायदा ही रह गए ।
महफिल में अपनी बात रखना, बस यूँ बेमानी रहा,
हम सुनाते ही गये, वो अनसुने से रह गए ।

शऊर इतना था कहाँ, कि रखलूँ अपनी बात को
ज़हन के कुछ अहम किस्से, बेबयाँ ही रह गए ।
दामन-ए- गफलत ही रही, कायदे समझे नहीं
लाख ताकीदों के चलते, न समझ ही रह गए ।

मसला ये हरगिज़ न था, बात को साबित करूँ,
सबब था, आसाँ सबब भी,नबूझते से रह गए ।

दास्ताँने आपबीती, जब जब सुनाने को उठे
साथ न दे पाई जुबां, अलफाज़ मुँह में रह गए ।
दिल के पुर्ज़े पे लिखी थी, दास्ताँने जिन्दगी,
जोर की आँधी जो आई,हवा के हवाले हो गये ।
जिल्द न बनवा सके सम्भाल के न रख सके
तलाश बेजा ही रही, किस्से जो गुम हो गए।

साल 2020

Impatience is root cause of most of evils.

घुटते सा बीत रहा 2020का साल

असंतोष के दामन से चिपका हुआ हर हाल

ताजा हवा के झोंके भी,रोक रहे हैं आने को

एक वायरस ताक में बैठा है, कब लेले चलती साँसों को।

न खाकर कभी अघाता जो

,गड़प साँस पे साँसों को

रुक जाओ चार दिवारी में, दूरी को ही अपना समझो

सामीप्य बुराई को मानो,उसको न अपना समझो

प्रकृति की सीख

प्रकृति से कर कर खिलवाड़
मानव तेरा न पेट भरा
कितना दोहन कर डाला
कांप उठी माँ वसुंधरा
जंगल काटे,वन तक उजाड़े
पर्वत पर आंच भी आई है
नदियों तक को कतई नहीं बख्शा
सागर तक आफत आई है ।
शायद प्रक्रति ने ठान लिया
अब तुझको पाठ पढ़ाने का
सीधे सीधे न समझ सका
तो तुझको राह दिखाने का।
इसी दशक में देख लिया
प्रकृति का क्रोध उफान पे है
जंगल ने आग जो उगली है
गुस्सा लगता ,परवान पे है ।
सुनामी ने दिखा दिया
मैं कब किसे लील जाऊं
कितना बच पाओगे मुझसे
मीलों पीछा करती जांऊ।
एक सूक्ष्म से जीव से देखो,
सारी दुनियां थर्रायी है
ये कुदरत का ही रोष समझ,
तेरे पापों की भरपाई है ।
तूने किया सतत् दोहन
प्रकृति पे तरस नहीं खाया
अब भी तेरा न पेट भरा
कर उजाड़,जितना मन भाया।
अब मांग रहा,बचने की राह
और शरण ढूंढता फिरता है ।
गलत राह जो ,जितना चढ़ता है ।
उतना वो नीचे गिरता है ।

जिन्दगी का कारवां कुछ इस तरह बढ़ता रहा

आगे निकल गईं ख्वाहिशे और मैं देखाने किया

भीड़ से घिर के रहा फिर भी अकेला ही रहा

रफ्तारे जहाँ शिद्दत पे थी,दर कदम न चल सका

मुझमें कहाँ कूबत थी ऐसी,पेचों खम जहाँ के जानें

बाद हिदायत के भी क्यों,गफलती में गुम रहा

अमल में न आ सका,मेरा फलसफा जिन्दगी

इत्तेफाक वो भी न रख सका,जो मेरा हमदम न रहा

ऊपर नजर आते रहे,अब्र स्याह आसमान में

उम्मीद की बारिक झलक को,देखने तरसा रहा ।

मेरी लकीरें हाथ की,बनती रहीं मिटती रहीं

नसीब की कोई लकीर उभरे,ताउम्र मंतज़र ही रहा ।

कहते हैं सिखा देगा तजुर्बा,उम्र के पकने के साथ

हर दिन उमर पकती रही,तजुर्बा मगर कच्चा रहा ।

अब न शिकवा न शिकायत,तुझसे ऐ मेरे जहाँ

जो था किस्मत का लिखा,कातिब वही लिखता गया ।

28.7.2020