जिन्दगी का कारवां कुछ इस तरह बढ़ता रहा

आगे निकल गईं ख्वाहिशे और मैं देखाने किया

भीड़ से घिर के रहा फिर भी अकेला ही रहा

रफ्तारे जहाँ शिद्दत पे थी,दर कदम न चल सका

मुझमें कहाँ कूबत थी ऐसी,पेचों खम जहाँ के जानें

बाद हिदायत के भी क्यों,गफलती में गुम रहा

अमल में न आ सका,मेरा फलसफा जिन्दगी

इत्तेफाक वो भी न रख सका,जो मेरा हमदम न रहा

ऊपर नजर आते रहे,अब्र स्याह आसमान में

उम्मीद की बारिक झलक को,देखने तरसा रहा ।

मेरी लकीरें हाथ की,बनती रहीं मिटती रहीं

नसीब की कोई लकीर उभरे,ताउम्र मंतज़र ही रहा ।

कहते हैं सिखा देगा तजुर्बा,उम्र के पकने के साथ

हर दिन उमर पकती रही,तजुर्बा मगर कच्चा रहा ।

अब न शिकवा न शिकायत,तुझसे ऐ मेरे जहाँ

जो था किस्मत का लिखा,कातिब वही लिखता गया ।

28.7.2020

जिन्दगी का कारवां कुछ इस तरह बढ़ता रहा

आगे निकल गईं ख्वाहिशे,और मैं देखाने किया ।

भीड़ से घिर के रहा,फिर भी अकेला ही रहा

रफ्तारे जहाँ शिद्दत पे थी,दर कदम न चल सका।

थी कहाँ ये मुझमें कूबत,पेचों खम जहाँ के जानलूं

बाद हिदायत के भी क्यों,गफलती में गुम रहा।

अमल में न आ सका,मेरा फलसफा जिन्दगी

इत्तेफाक वो भी न रख सका,जो मेरा हमदम रहा

ऊपर नजर आते रहे,अब्र स्याह आसमान में

उम्मीद की बारिक झलक को,देखने तरसा रहा।

मेरी लकीरें हाथ की,बनती रहीं,मिटती रहीं

नसीब की कोई लकीर उभरे,ताउम्र मंतज़र ही रहा ।

खाईयों के घुमावऔर अनजाने अजब से मोड़ पे

कोशिशों के बाद भी,हरबार टकराता रहा।

कहते हैं सिखा देगा तजुर्बा,उम्र के पकने के साथ

हर दिन उमर पकती रही,तजुर्बा पर कच्चा रहा।

अब न शिकवा न शिकायत,तुझसे ऐ मेरे जहाँ

जो था किस्मत का लिखा,कातिब वही लिखता गया ।

28.7.2020.

तल्खियां

तल्खियों को इतनी भी हवा न दे

कि शीरा भी तलख लगने लगे

मेरे हर सवाल पे ,तेरा मिज़ाज

अलग सा लगने लगे।

कल के वादे आज क्यों

बीती बात हो गये

जो फरेब में माहिर थे

तेरे साथ हो लिए

ताउम्र न छोड़ा साथ

,आज क्या वजह हुई

मेरी पाक साफ़ बात भी

क्यों बे-असर हुई ।

दीदार ए हुस्न

तेरे चेहरे को आशना ए दिल ने,कुछ इस तरह से देखा है
गोया वरिशों के बदलों में,नारंगी चमक को देखा है ।


तेरे चश्मों के झरने में,खालिस आब की झलक है
तेरे रुखसार में,अलसहर की लालिमा को देखा है ।


तेरे चेहरे पे बेतरतीब गिरती,ज़ुल्फ की घुंघराली लट को ,
इतराते हुए बेवाक होके,मचलते हुए सा देखा है ।


लब तेरे बंद और खुलते रहे कुछ इस तरह,
आफताब की किरण से जैसे खुलती,पंखुरी को देखा है ।

तेरी रंगत भरी गुन्चे गुलाब लाली की आब है ऐसी ,
दूर नीले फलक पे जैसे,शफक का अक्स देखा है ।


अब तू ही बता दे कि,तेरे
सिवा जाऊँ किधर मै ,
हर एक शामोसहर,तेरा जलवा ए हुस्न देखा है ।

मुआफ कर देना इस तेरे,दीदार की तलब को,
तेरे चेहरे पे ‘जहाँ का हुस्न’ एकसाथ देखा है ।

गुजारिश,बन्दगी,दरकार,चाहे जो समझले,
तेरे दीदार ए हुस्न का मंजर ही,गज़ब सा देखा है ।

आज के संदर्भ में ऑन लाईन शिक्षा द्वारा बच्चों व शिक्षक की समस्याओं का जिक्र है ।टिप्पड़ी द्वारा बताएं ।