श्रद्धांजलि

देश के वीरों को शत-शत नमन

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सूर्य (आफताब) की महिमा

आफताब (सूरज) देखने वालों ने,
तुझे में बे- पनाह नूर देखा है ।

तेरी ताकत को आंका है
जलवा तेरा पुरजोर देखा है
पर तेरी इस बात से लोग,
शायद नवाकिफ हैं
तेरी खूबी ए इंसाफ, हर शख्स के

बराबर से माफिक है ।
तू इंसाफ का ,कद्दावर सितारा है
कुदरत की मिसाले- देन,इंसाफ का खजाना है ।

अता करता है सभी को एक सी अपनी चमक
भूले से भी नहीं करता, अमीरी-गरीबी,- गरीबी में फरक।
तेरा नूर सबके हिस्से में बराबर से आया है,
हर शख्स ने तेरी तपिश को,एकसार पाया है ।
तेरे इंसाफ पे किसी शय का बस नहीं चलता
किसी आका के इशारे पे ,न उगता और न ढलता।
वरन ये ताकतें जहाँ ,तुझे भी अपने माफिक मोङ लेते,
तेरी हर किरण को ,अपने हक में जोड़ लेते ।

गरीब महरूम हो लरजता, एहसासे तपिश से
अल सुबह की धूप से, तेरी गर्मी की कशिश से ।
मौसम बदल करवट, बदल जाता जब चिलचिलाती धूप में,
मका बेबस के तप जाते, शातिरो की करतूत से ।

खुश हूँ ,तेरे इंसाफ के खालिस तरीके से, ।
कमतर किसी को नहीं आका।,किसी भी तरीके से ।
तेरे इंसाफ के पहिये की, रफ्तार सिलसिलेवार है,
जहाँ के हर शख्स पे, एक सी,एकसार है ।

मर्म की बात

राजनीति का मर्म क्या कोई जान सका
कब नीचे ऊपर हो जाये
दिसम्बर की कडी ठंड में,
चुनावी गर्मी गरमाये।
जनता का दिल कोई क्या टटोल सका,
किसके ऊपर आ जाये
कोई, चाहे कितना काम करे
उसको भी धक्का लग जाए
ये पता लगाना है टेढी खीर
जनता की आखिर क्या मर्जी है
प्रचार, कुप्रचार के बीच,
कौन सही, कौनसा फर्जी है ।

पाना विश्वास कठिन जितना
खोना उतना ही आसा है
हजारों नेक काम चाहे
हो जारी
किस चूक पे पड जाये भारी।

ये जनता जनार्दन है प्यारे
किसे सहलाए ,किसे प्यार करे,
किससे पल भर में जाये रूठ,
किससे बेमतलब रार करे ।

If can’t

Don’t creatisize, if can’t appreciate
Don’t distroy, if can’t create
Don’t be cruel,if can’t be kind
Don’t be aggressive, if can’t be polite.
Don’t be an enemy, if can’t be a friend
Don’t break heart, if can’t mend.
Don’t hate one,if can’t give love
Don’t be devil,if can’t be dove.
Don’t be selfish, if can’t be selfless.
Don’t curse others, if can’t you bless.

बाबुल के आँगन से शादी

बाबुल के आँगन से विदाई
कोना कोना ,घर का था गवाही
दरवाजे पे ,हथेली की छाप
बरबस दिलाती, विदाई की रात

शादी के गीतों पे ढोलक का बजना
रातों जगराता, महफिल का सजना
धमाचौकड़ी से महमानों का आना
शादी के शोर मे हँसना हँसाना

शादी का मंडप, कई दिन का मेला
उसी दिन न होती ,विदाई की बेला
हँसी ठिठोली, और नित रेलमरेला
केवल नही था ,ये एक दिन का खेला।

कई दिनों होता मेहमानों का जमघट
सुबह शाम लगती थी ,खाने की पंगत
बरसों छाप छोड़ती, रीति रिवाजों की बातें
धान बोते बोते, वो रोती सी आँखें

कोने मे खड़ा जो प्यारासा वीर
तकता बहन को,था कितना गंभीर
माँ का आँचल, वँधाता न धीर
सब ही हो जाते, धीर औ अधीर

ये घर का ही आँगन था,कई दिन का मेला
रौनक चहल पहल, कई दिन की वेला
मिट्टी की भट्टी का कोने मे लगना
भीनी सी खुशबु,पकवानों का पकना

लोकगीतों की धुन पे,सखियों का नाच
नाजुक कमर पे चमकता लिबास
गांव की मौसी ,और काकी भाभी
चुलबुले मजाक मे किस्से जवाबी

आज सिमट के सिकुड़ गई है शादी
जल्दी की हद तक, निबट गई है शादी
शादी घरों मे न उतना मजा है

चाहे हर कोना, कितना भी सजा है